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ऐ वतन तेरे लिए! -शम्भु चौधरी

‘‘जिस लोकतंत्र पर हम नाज करते हैं वह चन्द राजनेताओं की व राजनैतिक दलों की रखेल बन चुकी है। जिसका .....




  #1  
08-20-2011
shambhuji's Avatar
Member
 
: Jun 2011
: Kolkata
:
: 39 | 0.01 Per Day
Post ऐ वतन तेरे लिए! -शम्भु चौधरी


‘‘जिस लोकतंत्र पर हम नाज करते हैं वह चन्द राजनेताओं की व राजनैतिक दलों की रखेल बन चुकी है। जिसका मन आया इसको नचाया मन भर गया तो दूसरे को भी मजा लेने का मौका दे दिया गया। एक गया दूसरा आया जनता सोचती ये हमारे लोग हैं जो चुन कर दिल्ली में जातें हैं पर दिल्ली पंहुचते ही ये सत्ता के दलाल बनकर देश को बेचने का सौदा इसी लोकतंत्र के मंदिर में करने लगतें हैं। तब इन बेशर्मों को संसद की मर्यादाओं का तनिक भी ख्याल नहीं आता, उस वक्त देश की कौन कितनी बड़ी बोली लगाता है इसकी जोड़-तोड़ शुरू कर देते हैं यही लोग।’’
जल जायेगी धरती जब सत्ता के गलियारों में,
भड़क उठेगी ज्वाला तब नन्हे से पहरेदारों में।
(स्वरचित)
दोस्तों! यह लेख देश की दूसरी आजादी के पूर्व संध्या की लड़ाई के अवसर पर लिख रहा हूँ। हम आज आजादी की 65वीं वर्षगांठ मनाने के लिए जैसे ही छोटे-छोटे बच्चों के हाथों में तिरंगा झंडा थमाऐ बच्चे जोर से चिल्ला पड़े ‘‘अन्ना हजारे हम आपके साथ हैं।’’ हम खड़े देखते ही रह गए मानो किसी ने बच्चों के दिमाग को पागल बना दिया हो। देश की इस स्थिति के लिए हम सबके सब जिम्मेदार हैं। जिस संसद की मर्यादा रखना हम सबका न सिर्फ कर्तव्य, दायित्व भी बनता है, दुनिया के लोकतंत्रिय इतिहास के सबसे बड़े मंदिर के अन्दर चोर-बेइमानों का जमावड़ा हो चुका है। हमारी चुनाव प्रणाली बेइमानों को चुनने का मात्र एक साधन बनकर रह गयी है। जिस लोकतंत्र पर हम नाज करते हैं वह चन्द राजनेताओं की व राजनैतिक दलों की रखेल बन चुकी है। जिसका मन आया इसको नचाया मन भर गया तो दूसरे को भी मजा लेने का मौका दे दिया गया। एक गया दूसरा आया जनता सोचती ये हमारे लोग हैं जो चुन कर दिल्ली में जातें हैं पर दिल्ली पंहुचते ही ये सत्ता के दलाल बनकर देश को बेचने का सौदा इसी लोकतंत्र के मंदिर में करने लगतें हैं। तब इन बेशर्मों को संसद की मर्यादाओं का तनिक भी ख्याल नहीं आता, उस वक्त देश की कौन कितनी बड़ी बोली लगाता है इसकी जोड़-तोड़ शुरू कर देते हैं यही लोग। जिसे लोकतंत्र का नाम देकर देश को लूटने का जरिया बनाकर जनता पर हुक्म चलाते हैं जब इनकी बात न सुनी जाती तो संसद को चलने नहीं देते तब इनकी सभी कुकृत्य लोकतांत्रिक है। परन्तु जब जनता कुछ कहे तो उसको चुनकर आने या अर्मायदित शब्दों का प्रयोग कर संसद की गरिमा की दुहाई देते हैं। मानो संसद इनकी बपौती हो गई हो।
उसने कहा मैं पागल, मैं सोचा कि ‘मैं’ पागल। जब सच में हुआ मैं पागल, तो मुझको दिखा हम सब पागल।।
(स्वरचित)
दोस्तों! बैगर पागलपन के कोई लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। आज जिस चैराहे पर हम खड़ें हैं इसका एक रास्ता सीधा हम सबको खाई में धकेल देगा। जिसे हम लोकतंत्र समझतें रहें हैं वही लोकतंत्र घून की तरह हमारे देश को गत 64 वर्षों से लूटने का माध्यम बना हुआ है। आज उस पर ताला जड़ने और इन तमाम बेईमानों की काली कमाई को बन्द करने की आवाज उठाने की देश के कुछ ही लोगों ने थोड़ी सी हिम्मत ही की थी, कि इनकी बौखलाहट देखिये किस प्रकार देश की सारी ताकतों को चार-पाँच लोगों की जाँच करने के लिए झौंक डाली। संसद में बैठे किसी चोर ने उफ तक नहीं की। सारे के सारे जबान पर ताला लगा कर इनकी करतुतों का समर्थन करते रहे। जब इन बेईमानों का लेखा-जोखा और पिछले 64 सालों का खाया पीया निकाला जाएगा तब इनको कौन बचायेगा? अब समय आ गया है इन बेइमानों के सारे काले कारनामें का एक लम्बा इतिहास लिखा जाए।
आज संसद से ज्यादा जरूरी है देश को इन बेइमानों से बचाना। इसके लिए संसद के इनके काली कमाई करने के कार्यों पर ताला लगा कर देश में एक नए संविधान रचने के लिए जनता को कुर्बानी देनी ही होगी। शायद दुष्यंत कुमार ने इसी दिन के लिए यह लिखा था-
आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख, पर अंधेरा देख तू- आकाश के तारे न देख।
ऐ दरिया है यहाँ पर दूर तक फैला हुआ, आज अपने बाज़ुओं को देख पतवारें न देख।
दोस्तों! जिस तरह की भाषा का प्रयोग कांग्रसीजनों ने समाजसेवी आदरणीय श्री अन्ना जी के लिए किया यह इनका अहम है। इनको इस बात का गुमान हो चला है कि सत्ता के सिर्फ वे ही मालिक है एवं सिर्फ इनको ही देश सेवा का अवसर मिला है। जिस संविधान ने हमें देश में सिर्फ भ्रष्टाचारों की फौज भर दी हो उसको बदल डालना जरूरी हो गया है। अब सिर्फ लोकपाल बिल से इस देश को नहीं बचाया जा सकता। चाहे जन लोकपाल हो या सरकारी लुटेरों का सरकारी लोकपाल। इस देश को इससे कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है देश के नये संविधान लिखने की और यह इस संसदीय व्यवस्था के अंर्तगत कदापी नहीं लिखा जा सकता। अतः जबतक हम किसी नए संविधान को लिखने में समर्थ न हो जाते तब तलक देश के इस मंदिर को बंद कर सामने ताला लगा दिया जाना चाहिए। मानो अब देश को एक प्रकार से भ्रष्टाचारों का ग्रहण लग चुका है। ग्रहणकाल में देश की सबसे पवित्र लोकतंत्र की मंदिर को यदि हम ताला जड़ दें तो यह समझना चाहिए कि हम देश को ग्रहणकाल से बचाने में अपनी कुर्बानी देने जा रहें हैं।
पुनः दुष्यंत जी कि इस पंक्ति के साथ अपनी कलम को आज विराम दूँगा-
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी, शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।
http://shambhuchoudhary.jagranjunction.com/
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  #2  
08-20-2011
Junior Member
 
: Aug 2011
: gwalior
: 37
:
: 1 | 0.00 Per Day

your opinion is good. but i am indian and i see both and little question in my mind ...........yaar ya desh hamara hai....... ham ko hi isko thik kerna hai.ham jab in brastaachariyo ko chun ker bhajta hai. isi karn ya ham per raaj kerta hai.....ham aager hath mai jutaa laker in ko inki jagha bata dai to nayaa ka mandir in sa mukt ho jayaga aur lokshaba vaastav mai loksabha ban jayagi........
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  #3  
08-22-2011
Junior Member
 
: Jun 2011
: Mp
: 30
:
: 2 | 0.00 Per Day
Inklab jindabad bande matram jay hind anna tum sangharsh karo ham tumhare sath hain..........

Inklab jindabad




bande matram

jay hind
anna tum sangharsh karo ham tumhare sath hain..............
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  #4  
08-22-2011
Junior Member
 
: Aug 2011
: India
: 32
:
: 3 | 0.00 Per Day

shambhu ji aapka lekh acchha laga
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